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यादें

यादें सिलवटों की तरह होती है। परत-दर-परत बेतरतीबी सी सिमटी हुई। बचपन को याद करो तो लड़कपन याद आता है। वर्तमान को देखो तो अतीत हर जिल्द में पिरोया दिखता है। साल-दर-साल जमा होते जाते है और उम्र बढ़ती जाती है; जो अभी कल का लगता था उसको दशक बीत गए है।   यादें डामर की सड़कों सी सपाट नहीं होती , मस्तिष्क में पगडंडियों का बिछा जाल है। एक दूसरे में गुत्थी, उलझी, धुंधलाती लकीरों सी, मानो किसी ने बहुत से धागों को एकसाथ समेट कर रख दिया हो।    बहुत पुराना कुछ याद करने का प्रयास करोगे तो हाल का कुछ याद आएगा और अभी , का कुछ याद करोगे तो उसमें छुपी पुरानी याद; जी उठेगी। जब आप यादों में धंसते है ; यह देखने को की कौनसी याद सबसे पुरानी है; तब आप पाते है की उस क्षैतिज पर जाकर नजर धुंधला जाती है। दृश्य बनते और बिगड़ते है। मुकड़े याद आते है तो पहचान घूम हो जाती है; बोल फूटते है तो संदर्भ गायब हो जाते है। कुछ बड़ी घटनाएं हमेशा याद रहेगी लेकिन उनके विवरण सूखते जाते है। बहुत मुश्किल है ; यह तय कर पाना की कौनसी याद शुरुआती है। बचपन के संगी साथी याद आते होंगे, खेल और उनमें लगी चोट याद होंगी; ...
इंसानी गणित और उसका कर्महीन उत्साह। निष्कर्ष, धारणाएं और थोपी हुई मर्यादा। बाते, खबरें और सूचनाएं सब अधकचरी, और उगली हुई है। सच केवल भोगा और जिया हुआ है। कबीर जिसे आँखन देखी कहते है।  अज्ञेय ठीक ही कहते थे। " मौन ही अभिव्यंजना है; जीतना तुम्हारा सच है उतना ही कहो " कहा सागर ने : चुप रहो! मैं अपनी अबाधता जैसे सहता हूँ, अपनी मर्यादा तुम सहो। जिसे बाँध तुम नहीं सकते उस में अखिन्न मन बहो। मौन भी अभिव्यंजना है : जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो। कहा नदी ने भी : नहीं, मत बोलो, तुम्हारी आँखों की ज्योति से अधिक है चौंध जिस रूप की उस का अवगुंठन मत खोलो दीठ से टोह कर नहीं, मन के उन्मेष से उसे जानो : उसे पकड़ो मत, उसी के हो लो।

इंसानी गणित

ओह! तुम जीत गए। तुम्हारी कितनी बड़ी जीत? ओह! तुम हार गए तुम्हारी कितनी शर्मनाक हार? अच्छी बात, पर सूरज वहीं उगा  जहां से रोज उगता है इंसानी गणित और उसका कर्महीन उत्साह सब निराधार तुम्हारी जीत भी, हमारी हार भी

PS-I

कुंदवई चोल साम्राज्य की एक राजकुमारी ,   परान्तक द्वितीय और वनवन महादेवी की पुत्री थीं।  वह तिरुकोइलूर में पैदा हुई  और चोल सम्राट राजराजा प्रथम की बड़ी बहन थी । उनका नाम इलैयापिरत्ति कुंडवई नचियार था ।   PS -I मूवी में कुंडवाई का किरदार तृषा ने पूरे राजोचित अहम के साथ निभाया। ऐश्वर्या (नंदिनी के रूप में) के बरक्स तृषा की अदाकारी कही से भी कमतर नही है। उनकी भावभंगिमा में राजकुमारी का गुरुर और आत्मविश्वास झलकता है।  इतिहास में राजकुमारियो का वो स्थान नहीं रहा जो राजकुमारो का रहा है। राजकुमारियां का प्रयोग राजनैतिक सांठगांठ और दुर्भी संधियो में एक वस्तु के रुप में होता रहा है। यह कोई नई बात नही है।   लेकिन कुंडवई महलों की साज- सजा और श्रृंगार के लिए ही नही बनी थी। उन्होने इतिहास में पोन्नियन सेलवन (राजराज प्रथम )  की बडी बहन और संरक्षक के साथ राजेंद्र प्रथम के अभिभावक की भूमिका भी निभाई । यानि चोल वंश का महान इतिहास कुंडवई के हाथो में पुष्पित और पल्लवित हुआ।  उन्होंने हिंदू और जैन मंदिरों का निर्माण तो करवाया ही। साथ ही तिरुवंतपुरम में एक ...

रामराज्य

आशुतोष राणा की भाषा में राम भक्ति, शक्ति और वैराग्य का पुंज है। भरत जहां भावों से भरे है , उन्हें मृण्मय में भी चिन्मय दिखाई देता है; वही राम का चित्त ज्ञानी का चित्त है। वह भाव आसक्त होकर भी उनसे परे है। उन्हे चिन्मय में भी मृण्मय दिखाई देता है। इसलिए जगत और संबंधों की निस्सारता से विलग वनवास का चुनाव राम ही कर सकते हैं। कोई और नही।   राम की कहानी को जाने कितनी चेतनाओं ने अपने-अपने विमर्शों से कहा है। वाल्मीकि के पौराणिक राम, तुलसी के मध्यकालिन राम और निराला की "राम की शक्ति पूजा" के आधूनिक पुरषोत्तम नवीन राम ; आशुतोष राणा के यहां तक पहुंचकर प्रगतिशील वैरागी  चेतना के राम बन जाते है। राम की कहानी और कथानक को जितनी बार  और जितने तरीकों से गाया और बखाना गया है वैसा दूसरा उदहारण दुनिया में शायद हो। क्या यही " संभवामि युगे-यूगे नहीं है" "रामराज्य"  में आशुतोष राणा ने कई मौलिक उद्भावनाए की है। कैकेयी और शूर्पणखा जैसे कलंकित माने जाने वाले चरित्रों को अपराध से मुक्त करने का प्रयास किया। वनवास को कैकेयी की महत्वकांक्षा न मानकर राम का स्वयं में इच्छित अपेक्षा मान...

Winter is coming

सावन की उमड़ती- घुमड़ती घटाए अब नही, न भादो की बौछार है। बिजली की कड़कड़ाहट भी अब सुनाई नही देती, न काली घटाए ही चढ़-चढ़ कर आती है। आसोज की अंतिम रात है। शरद पूर्णिमा। वर्षा ऋतु को यहां समाप्त समझो। भूले-भटके, लोटते बादळे बरसते जाते है। मानो विदा ले रहे हो कि अब एक वर्ष की गई।   बरखा का वो जोर अब नही। और आसोज ( अश्विन) महीने की पूर्णिमा ( शरद पूर्णिमा) तो शरद ऋतु की शुरुआत ही है।  बरस-बरस कर आसमान रीत गया है। मानो सारा मतमैलापन पानी संग बरसा हो।  साफ, नीला, ओस से भींगा आकाश। धरती की नमी से आबद जान पड़ता है। जैसे गीली धरती की उच्छावास (सांस) से भाप युक्त हो गया हो।  शरद का मौसम सबसे सुहाना और स्वच्छकारी है। पठारो और मैदानों में भी पहाड़ों जैसी सुहानी जलवायु का लुत्फ । दिन सामान्य और राते ठंडी होने लगती है।  सुबह की ओस से भींगी घास और संध्या का खिला लालिमा युक्त नीलाम आकाश। नदी-नाले, ताल-तलैया डबडबाई आंखों से भरे है। हवा का रुख बदलने लगता है। मंद हल्की हवा , नहाई धुली लगती है।  आसोज में पकी फसले , काती ( कार्तिक) में कटने को तैयार होती है। दिवाली तक खेत ...

सफर

जीवन एक यात्रा है। मुक्तलिफ तजुर्बों , एहसासो और मुलाकातों का ऐसा सफर जिसके अनगिनत रंग है। शहर बदलते है। ठोर-ठिकाने बदलते है। हमयात्री बदलते है। हर बदलाव के साथ हम भी बदलते है। जहनी तौर पर भी और जज़्बाती तौर पर भी। नए संकल्प पुरानी पराजयों को प्रतिस्थापित कर देते है।  नई उम्मीदें , अधूरी आशाएं और आधे- अधूरे मन से हम एक नए परिदृश्य का हिस्सा बनते है। बस कैनवास के रंग बदलते है। कुछ रंग हम जोड़ते है। कुछ नए दोस्त, थोड़े बहुत अजनबी और अधिकतर अनायास ही जुड़ जाते है। स्याही कम करते है। कुछ सफेदी बढ़ाते है। चटक, सतरंगी, रंगो के कुछ छींटे और इस तरह जबतक कोई मुक्कमल तस्वीर साकार होती है तब तक हम चल देते है।  एक नए कैनवास की तरफ।  जैसे हम ठीक वह कह नही पाते है जो कहना चाहते है। या जो हमे कहना चाहिए होता है;  जैसे हम ठीक वह रच भी नही पाते है ; जो रचना चाहते है। वैसे ही हम  ठीक उस तरह   जी भी कहां पाते है जैसा जीना हम चाहते थे। लेकिन फिर भी जब भी हम किसी के कैनवास (जिंदगी ) में खुद को अनायास ही  उपस्थित पाते है तो कोशिश करते है की कुछ जिंदगी की कालिमा को...
जिन्दगी में हम कहीं ने कही सफल होते ही है। हमारे लिए सफलताओं के पैमाने आत्मनिष्ठ हो सकते है और होते भी है। हो सकता है आपकी सफलताएं और संघर्ष किसी और के लिए बहुत मामूली बात हो। हो सकता है कि कोई और जीवन के किसी दूसरे क्षेत्र में आपसे बहुत अच्छा कर रहा हो। लेकिन इससे आपकी सफलता और संघर्ष का महत्व कम नहीं हो जाता है। खुशी इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए की सांसारिक रूप से आपकी कामयाबी कितनी बड़ी है बल्कि मायने यह रखता है की लक्ष्य को लेकर आपके प्रयास , आपकी शिद्दत , आपकी मेहनत कैसी थी।  हर कोई अपने रुझान और जहन के अनुसार सपने बुनता है और उन्हें पाने का प्रयास करता है। कभी-कभी किस्मत हमारा साथ देती है तो कभी दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ता। लगातार प्रयासों के बावजूद मंजिल कही दिखती नजर नहीं आती। ऐसे में  प्रेरणा और हौसला अफजाई की नई मिसाले हमारे सामने उभर आती है। चुनौतियों  से बड़ी चुनौतियों, मुश्किलों से बड़ी मुश्किलों, और अभावों से बड़े अभावों में भी लोग अपने सपनो को साकार करते हुए दिखते है। सारे प्रश्नचिह्नो और नियति के पूर्ण विरामों के बावजूद कमल जी की मेहनत  और अथक प्र...

पुरानी सारी महफिलें जा चुकी है

पुरानी सारी महफिलें जा चुकी है। यह और बात है कि मै नहीं उठा। पहले असबाब उठाए गए।  फिर चिराग बुझा दिए जो कभी न जाने कि कसमे खाए बैठे थे सबसे पहले वो उठ कर गए  फिर वो गए जो कभी आए ही नहीं। पुरानी सारी महफिलें जा चुकी है। यह और बात है कि मै नहीं गया। धीरे  से यार उठकर गए।  शिकायत करते  जो 

The Last Girl

इरका के उतरी- पश्चिमी भाग मे स्थित सिंजर क्षेत्र में यजीदी छितरे रूप में बसे है। यहीं कोचो गांव नादिया मुराद का गांव है। कोचो - गांवों जैसा गांव था। अधिकांश आबादी खेती और चरवाहा का कार्य करती थी। सींजर पहाड़ की तलहटी मे भेड़ चराने वाले गडरियों, और अरबी व्यापारियों की आवाजाही देखी जा सकती थी। एशिया कि तपा देने वाली गर्मी और शुष्क सर्दियां। तमाम भू - राजनैतिक तनावों और मुश्किलों के बीच लोग जिंदा थे। लेकिन साल 2014 कोचों गांव के लिए कयामत लेकर आया।    कोचों मे 3000 कि आबादी थी और सारे यजीदी। यजीदी अरबी नहीं है, वो पूरे कुर्द भी नहीं है न उन्हें मुस्लिम ही माना जाता है। वो एक अलग पंथ को मानने वाले लोग है। उनकी मान्यताओं पर कुछ प्रभाव इस्लाम और ईसाइयत का भी है तो कुछ प्रभाव ईरान के प्राचीन पारसी धर्म का भी। कुछ समानताएं आश्चर्यजनक रूप से भारत के वैदिक धर्म से भी मिलती है। यजीदीयो के अपने मंदिर होते है, पूर्वजन्म कि मान्यता है, सूर्य कि उपासना और दीप प्रज्वलन भी प्रचलित है।  यजीदी दुनिया के प्राचीनतम धार्मिक समुदायों में से एक है। दजला और फरात नदियों के दोआब मे मेसोपोटामिया सभ...

एस रामानुजन

मेरे लिए एक समीकरण का कोई मतलब नहीं है जब तक कि वो भगवान के विचार को व्यक्त नहीं करता।- एस रामानुजन ( The Man who knew infinity) हम अन्तता के मात्र खोजकर्ता है, पूर्णता कि खोज में। हम इन सूत्रों का आविष्कार नहीं करते, वो पहले से ही मौजूद है। और इंतजार मे रहते है बहुत उज्जवल दिमाग और अंतः प्रज्ञा के। जैसे- रामानुजन।- ब्रिटिश गणितज्ञ हार्डी वो जो साबित नहीं हुआ लेकिन वो है। वो जो घटित नहीं हुआ किन्तु मौजूद है। वो सूत्र/प्रमेय जो हल नहीं किया गया परन्तु उसका अस्तित्व है। बस देखने के लिए रामानुज जैसी अंत: प्रज्ञा होनी चाहीए।  हार्डी जैसे तर्कवादी किसी ऐसे सूत्र या विचार के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते जिसे वो साबित नहीं कर सकते। वो हर उस विचार को नकारते है जिसका मूर्त और अमूर्त साक्ष्य मौजूद नहीं है। लेकिन रामानुजन को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वो साबित किया जा सकता है या नहीं बस उसे नकारा नहीं जा सकता। कोई भी उसके वजूद से इंकार नहीं कर सकता।  वो उसके होने को पहले महसूस करते है भले ही उसके अस्तित्व को साबित अभी नहीं किया जा सका। यहीं बात रही कि  उन्होंने 3000 से अधिक प्रमे...

interview transcription।

Interview Board - एयर मार्शल अजीत भोसले Date- 04 अगस्त 2021 Optional - Hindi literature State- राजस्थान  Hobby- Reading Autobiography Job- Primary School Teacher starting- क्या मै अंदर आ सकता हूं sir ? Ch- आइए।  Me- नमस्ते sir 🙏, नमस्ते मैम। Ch- नमस्ते नमस्ते। बैठिए। आराम से बैठो। शील्ड उतार दो। मास्क लगाए रखो। पानी पड़ा है पी सकते हो। आप जहां बैठे थे बाहर डॉक्यूमेंट हॉल में । वहां आपके चाय नाश्ता था या नहीं ?  Me- जी sir था। Ch- आपने कुछ लिया? Me- sir वहां आम का जूस ( फ्रूटी) था। मैने सोचा डॉक्यूमेंट चेक होने के बाद लूंगा लेकिन जब तक मै free हुआ तब तक वो ख़तम हो चुका था तो मैंने केवल पानी लिया sir ( मेम्बर स्माइल 😊) Ch- तो आपने सुबह से कुछ नहीं खाया? Me- सुबह नाश्ता किया था। Ch- लंच भी नहीं? तो आपमें एनर्जी नहीं होगी? Me- Sir बाहर orange का जूस पिया। Ch- अच्छा अब धीरे धीरे पता चल रहा है हमें भी कि क्या क्या खाया। ( सब हंसने लगे) Me 😊 Ch- अच्छा चलो शुरू करते है। आपसे बात करेंगे। आपके विचार जानेंगे। Oky Me -oky sir। Ch- NEP में बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए ...

होमो सेपियंस कि भाषा।

सेपियंस की सम्प्रेषण दक्षता  सबसे बड़ी खूबी उसकी भाषा का लचीलापन है। हम इतनी भिन्न ध्वनियों के समूह का निर्माण करने में कामयाब रहे है जिससे कि  हम जीवन भर गॉसिप कर सके, महाग्रन्थों को रच सके। लचीला होने का मतलब हम एक ही ध्वनि को अन्य कई ध्वनियों के साथ प्रयोग कर अंतहीन संवाद कर सकते है। यानी हमारी भाषा एक ठोस कड़ा नही होकर ध्वनियों कि एक माला है डॉ हरारी इसके लिए मिसाल देते है कि एक बंदर एक आवाज निकालकर केवल यह कह सकता है  कि "भागो शेर आया है" लेकिन एक होमो सेपियंस इस पर घण्टो बतिया सकता है कि मैंने नदी किनारे एक शेर को हिरणों का पीछा करते देखा है , वो हमारी तरफ आ सकता है और उसे कैसे खदेड़ा जाए....इत्यादि इत्यादि। बताने के अलावा वो सम्भावित परिणामो व उपायों की कल्पना भी कर सकता है। सेपियंस कि इन भाषाई दक्षताओं ने उसे दो काम करने में समर्थ बनाया। पहला गपशप (गॉसिप) करना और दूसरा कल्पनाओं की असीमित उड़ान भरना। गॉसिप करने की खूबी ने होमो सेपियंस को एक गजब की सामाजिक समायोजन की ताकत दी। अब वो समूह में लोगो की निंदा कर सकता था, बोलकर सहयोग व साथ कि गुजारिश कर सकता था और चालाकी से...

ए डायरी ऑफ यंग गर्ल।

जैसे आप हो? जैसा आपने महसूस किया ? जो सोचा ? वैसा का वैसा खुद को व्यक्त कर देना, किसी से बात करते वक्त या डायरी लिखते समय मन खोलकर रख देना उतना आसान नही होता जितना लगता है। हम सब जब भी कुछ लिखने का प्रयास करते है खुद के साथ भी पूरी  ईमानदारी से पेश नही आते। यानी हम अपने मनोभावों को पूरी तरह से व्यक्त नही कर पाते है। यहां तक कि हम एक कागज के सामने भी अपना दिल खुलकर नही रख सकते। उससे भी बहुत सी बातें छुपाते है। उससे भी चालाकियां करते है। और उसे भी चयनात्मक ही बताते है। पारदर्शी अभिव्यक्ति सबसे मुश्किल है। लोग अक्सर एक पेज भी बिना किसी बनावट के या लागलपेट के नही लिख सकते है! अपने बारे मैं भी नही; और जो लिख दे तो समझो उसका लेखन कौशल संवेदना की दृष्टि में सर्वोच्च है। अज्ञेय के शब्दों में कह तो भोगने वाले मन और रचना करने वाले मन के मध्य एक अनिवार्य अंतराल होता है। चालाकियों और प्रतीकों की एक खाई होती है । यह अन्तराल जितना कम, यह खाई जितनी उथली होगी। रचना उतनी ही महान बन जाएगी। पश्चिमी साहित्यालोचक टी एस इलियट ने इसे "ऑब्जेक्टिव कोरिलेटिव" कहा है। अर्थात आप जो सोचते और महसूस करत...

दो पत्रकार दो आत्मकथा

दो पत्रकार। दो आत्मकथाएँ। वो भी भारत की आजादी के बाद के दौर से लेकर वर्तमान तक के एक समान कथानक और कंटेंट में । अपने आप मे रोचक और तुलनात्मक अध्ययन है। आप समझ पाते है कि एक ही घ...

पहला कदम मानसिक मजबूती

"Note- यह लेख सिविल सर्विस में चयनित अनामित व्यक्ति का है। अच्छा लगा इसलिए मेरे ब्लॉग पर पुनः प्रकाशित किया गया है।  सारा क्रेडिट उनका है अपने हिस्से केवल साझा करने का श्रेय है।" यदि आपने आई.ए.एस. बनने का फैसला कर ही लिया है, तो देश के इस सबसे बड़े और काफी कुछ कठिन दंगल में आपका स्वागत है। मेरी शुभकामनाएं भी हैं, और ईश्वर से आपके लिए प्रार्थना भी है कि वह लम्बे समय तक आपके धैर्य, आपके आत्मविश्वास और आपके जोश को बनाए रखे, क्योंकि ये बातें इसके लिए बहुत जरूरी होती हैं। फिर भी, इससे पहले कि मैं आपको यह बताऊं कि आप आई.ए.एस. कैसे बन सकते हैं, मैं आपसे एक प्रश्न पूछने की, बहुत ही जरूरी और मूलभूत प्रश्न पूछने की इजाजत चाहूँगा। मैं आपसे यह प्रश्न इसलिए पूछना चाह रहा हूँ, क्योंकि मैंने आई.ए.एस. के विद्यार्थियों का मार्गदशन करने के अपने लम्बे अनुभव में यह पाया है कि हमारे नौजवान जोश में आकर पर्याप्त सोचे-समझे बिना ही इस दंगल में कूद पड़ते हैं, और कुछ सालों तक पटखनी खाने के बाद पस्त होकर इससे बाहर आ जाते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि इस प्रतियोगिता में उतरने से...

जिंदगी धूप और छाँव की उपमा ही नही

जिंदगी धूप और छाँव की उपमा ही नही। एक तेरे होने का अहसास भी है। अब, दुनियां इतनी छोटी भी नहीं की, उसे मुट्ठी में दबाकर तेरी जेबों में भर दू। या तारे इतने योग्य नहीं की उन्हे तेरे लिए जमी पर उतारू सुनाना तुझे मै  परीकथाओं की कहानियां भी नही चाहता नही चाहता मै कि, तू मेरी नज़र से ही देखे  मुझसा ही सोचे, चले , गुनगुनाएं वैसे तो रंग-ए-दुनिया में कहने को क्या नही , पर जो तुझसे कहना हो तो बस यही की।    "तेरी मासूम हथेली के स्पर्श से जो मुझमें संजीव हो उठा , उस जीवटता को जीने के लिए तुम्हारा स्वागत है बच्चे।।"

रेखाएं हाथों की खुद ही जोतनी होगी

लम्हें खास होने की अदावत में है तू एक भरी नजर तो देख। कुछ नया करने की इच्छा दबाए पांवों से कुरेदते जमी वक्त सफेद बादलों सा उड़ रहा मकबूल मौसम कभी रहे तो नही यह दुःख , मायूसी , उसकी शरारत में है तू एक भरी नजर तो देख। रेखाएं हाथों की ख़ुद ही जोतनी होगी कर्मो पर चलाने होंगे,  हल बुनने होंगे रूई से ख़्वाब यूंही आखिर पत्ते जड़ नही जाते बगैर नई कपोलों की आहट यह हार, शिकस्त , पस्त  तो किस्मत में हैं तू एक भरी नजर तो देख। मछलियां बड़ी, छोटी को, खा भी तो जाती है उन पर नही लगता धर्म का पाप कोई अनैतिक भी तो नही है, मानता सदियों से चलन भी तो यही रहा यह बदलती वफ़ाए, न्याय के दोहरे मापदंड हकीकत में है तू एक भरी नजर तो देख। इसलिए दुविधाएँ कम हो जितनी, सही है द्वंद्व का चिंतन, अक्सर बेअसर है सोचते नही,  रचने वाले, सुविधानुसार, विचारधाराओं को प्रस्तावक, बदलते रहते है, अक्सर जरूरत पड़ने पर, कूच कर जाते है लश्कर, अपने हिस्से के साथ सब होते है, मगर न होते साथ कोई यह एकाकीपन , बिछुड़न तो सफर में है तू एक भरी नजर तो देख। इसलिए , रेखाएं हाथों की खुद ही जोतनी होगी। I...

कुछ यूं ही

अंतर्मन के द्वंद्व कहाँ नही होते ? हर मन उलझनों से शोषित है। हर चेतना द्वैत से अभिशिप्त। किसी को वो नही चाहिये जो है । सबको उसी की चाह है जो नही है। तुलनात्मकता जीवन के सुख- दुः...

तुमसे निभ जाए वही जिंदगी नही।

तुमसे निभ जाए वही जिंदगी नही जीने के मकसद और भी है। हादसों की अपनी नियत,  लेकिन तुम्हारे सिवाय किस्मत और भी है। जिन्हें दुनिया के साथ चलने का रंज नही उनके  मुकामों के बिना सफ़र और भी है। एक पहलू ही नही होता ख्वाब का ख्वाबों के पहलू और भी है। सफेद या काले ही नही होते लोग दुनिया-ए-गुलशन में रंग और भी है। बुरा हुआ जो ; ये हार गए, लेकिन उठो जँगजुओ जितने को दुनिया मे सल्तनतें और भी है तेरे किस दुःख पे रोई जिंदगी , लेकिन जो मुस्कुराने की वजह और भी है।